Saturday, October 22, 2011

अभिनन्दन

जो दीप नहीं बुझते तूफानों में भी,
उजियारा उनका अभिनन्दन करता है|

जो जलते केवल जलने को,

दब जाते स्वयम अंधियारे तले,
जो दीप नहीं बुझते तूफानों में भी,
उजियारा उनका अभिनन्दन करता है|

जो पग नहीं रुकते कांटो पे भी,

जग उनका अभिनन्दन करता है,
गिरना, फिर उठना जीवन का क्रम है,
गिर के भी जो उठाना जाने,
सोपान उसका अभिनन्दन करता है|

जो निश्चय करते हर श्वास में,

तप करते आत्म तेज पुंज से,
विष पी शिव ज्योति धारण करते,
जो बाण नहीं मुड़ते बिंध जाने पे,
लक्ष्य उनका अभिनन्दन करता है|

जो दीप नहीं बुझते तूफानों में भी,

उजियारा उनका अभिनन्दन करता है|

Sunday, September 11, 2011

संदूक


मैंने फिर आज
पुरानी यादों का
संदूक खोला
गुज़रे लम्हों को तोला।

कुछ ढलके आँसू
जो अब भी नर्म थे,
भूले बिसरे अफ़साने
जो अब तक गर्म थे।

कुछ मोटी, कुछ पत्थर
जो मैंने बटोरे थे।
बचपन की यादों के
रेशमी डोरे थे।

कागज़ के टुकड़े थे
अनलिखी कहानी थी।
हो गई फिर ताज़ी
पीर जो पुरानी थी।

बंद संदूक में
ख्वाहिश की कतरन थी।
टेबल की थापें थीं
टुकड़े थे, परन थीं।

देखा, सराहा
कुछ आँसू बहाए।
बंद संदूक में
फिर सब छिपाए।


मैंने फिर आज
पुरानी यादों का
संदूक खोला
गुज़रे लम्हों को तोला।

Sunday, September 4, 2011

दुआ


हँसने का हँसाने का हुनर ढूंढ रहे हैं
हम लोग दुआओं में असर ढूंढ रहे हैं

अब कोई हमें ठीक-ठिकाने तो लगाए
घर में हैं मगर अपना ही घर ढूंढ रहे हैं

जब पाँव सलामत थे तो रस्ते में पड़े थे
अब पाँव नहीं हैं तो सफ़र ढूंढ रहे हैं

क्या जाने किसी रात के सीने में छिपी है
सूरज की तरह हम भी सहर ढूंढ रहे हैं

हालात बिगड़ने की नई मंज़िलें देखो
सुकरात के हिस्से का ज़हर ढूंढ रहे हैं

कुछ लोग अभी तक भी अंधेरे में खड़े हैं
कुछ बात  करने की सहर  ढूंढ रहे हैं

हँसने का हँसाने का हुनर ढूंढ रहे हैं
हम लोग दुआओं में असर ढूंढ रहे हैं

Saturday, July 2, 2011

मन

उस पर जाने किस किसका तो बंधन होता है
अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है ।

तन से मन की सीमा का अनुमान नहीं लगता
तन के भीतर ही मीलों लम्बा मन होता है ।

वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को
जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।

अँधियारा क्या घात लगाएगा उस देहरी पर
जिस घर रोज उजालों का अभिनन्दन होता है ।

दुख की भाप उठा करती हैसुख के सागर से
ऐसा ही, ऐसा ही शायद जीवन होता है ।

हम-तुम सारे ही जिसमें किरदार निभाते हैं
पल-पल छिन-छिन उस नाटक का मंचन होता है ।

तन की आँखें तो मूरत में पत्थर देखेंगी
मन की आँखों से ईश्वर का दर्शन होता है ।

Friday, July 1, 2011

Dream



I have a dream
That a mermaid realm
From deep in ocean main
Is wooing me to swim
In an ecstatic élan
Clasping to their bosom


I have a dream
Someone is humming
From a celestial domain
To come and dine
With them in the halos
Of angelic shine


Let me yarn these whims
It’s my right to dream
My well-cherished regime
Be it far from realism
I’ll be happy to resign
From this unromantic pragmatism