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Wednesday, January 25, 2012

COMPLEX BUT ADMIRABLE...

Sometime, you come across with people who are blend of emotions and aspirartions...blend of pain and relief..blend of rise and fall...blend of maturity and innocence...blend laughter and silence. The more you know them...more you revisit your opinion about them.
For past one week reconciling my grey matter for the same and after yesterday evening come to conclusion that some people are above words of appreciation...
These line for her...


Her smile is like a gentle brook
Bubbling along its way,


Unmindful of the path ahead,
Be it night or day!


Her eyes like liquid pools
That torments our soul.


Their depths so unfathomable,
An unreachable goal!


She casts a glance and looks away,
Her eyes, their deed they've done.


Slain one more aching heart,
One more battle won!


When she smiles, the sun comes out
Like on a hot summer's day.


And like a soothing balm
She takes the pain away!



Thursday, December 8, 2011

माँ मगर वो सुख नही है जो तुम्हारे प्यार में है..............

यहाँ हर ओर चेहरों की चमक जब भी है मिलती मुस्कुराती है,
यहाँ पाकर इशारा ज़िन्दगी लंबी सड़क पर दौड़ जाती है,
सुबह का सूर्य थकता है तो खंभों पर चमक उठती हैं शामें,
यहाँ हर शाम प्यालों में लचकती है, नहाती है
दुःख ठिकाना ढूँढता है, सुख बहुत रफ़्तार में है..
माँ मगर वो सुख नही है जो तुम्हारे प्यार में है..............

यहाँ कोई धूप का टुकडा नही खेला किया करता है आंगन में,
सुबह होती यूँ ही, थपकियों के बिन,कमरे की घुटन में
नित नए सपने बुने जाते यहा हैं खुली आंखों से,
और सपने मर भी जाएँ तो नही उठती है कोई टीस मन में
घर की मिटटी, चांद, सोना, सब यहा बाज़ार में है...
माँ मगर वो....................

ओ मेरे प्रियतम! हमारे मौन अनुभव हैं लजाते,
हम भला इस शोर-की नगरी में कैसे आस्था अपनी बचाते,
प्रेम के अनगिन चितेरे यहा सड़कों पर खडे किल्लोल करते,
रात राधा,दिवस मीरा संग, सपनो का नया बिस्तर लगाते,
प्रेम की गरिमा यहाँ पर देह के विस्तार में है...
हां मगर वो............

कह री दुनिया ? दे सकेगी कभी मुझको मेरी माँ का स्नेह-आँचल,
दे सकेंगे क्या तेरे वैभव सभी,मिलकर मुझे, दुःख-सुख में संबल,
क्या तू देगी धुएं-में लिपटे हुये चेहरों को रौनक??
थकी-हारी जिन्दगी की राजधानी,देख ले अपना धरातल,
पूर्व की गरिमा,तू क्यों अब पश्चिमी अवतार में है??
माँ मगर वो........................

Sunday, November 6, 2011

Now That You Are Gone


 Now that you are gone,
Happiness has eluded my mind,
As it knows
There is not an iota of joy.

Now that you are gone,
Happiness has eluded my mind,
It has promised
It would never come again
Until we bring it back.

The sounds of laughter replaced by silence,
Smiles replaced by frowns,
It seemed the world
Is one dark, doomed place
Where sorrow knew no bounds.

The grief so intense,
my mourning so deep,
I was lost in tears,
And profoundly bereaved;
I consoled my heart 

With unspoken words,
Stifled our lengthy sigh;
As tears rolled down my cheeks,
It was time to say goodbye.

She was a rebel, we knew long back,
But never knew
She would end this way.
She had chosen this fate the very day,
Her beau had passed away.

  I will rise like the phoenix, from the grief, but wont let you rest your soul;
You will be with me as much as I will be with you,
Just like my good old days.
  I will find you among the stars in the sky,
And in the fresh morning dew.

Saturday, October 22, 2011

अभिनन्दन

जो दीप नहीं बुझते तूफानों में भी,
उजियारा उनका अभिनन्दन करता है|

जो जलते केवल जलने को,

दब जाते स्वयम अंधियारे तले,
जो दीप नहीं बुझते तूफानों में भी,
उजियारा उनका अभिनन्दन करता है|

जो पग नहीं रुकते कांटो पे भी,

जग उनका अभिनन्दन करता है,
गिरना, फिर उठना जीवन का क्रम है,
गिर के भी जो उठाना जाने,
सोपान उसका अभिनन्दन करता है|

जो निश्चय करते हर श्वास में,

तप करते आत्म तेज पुंज से,
विष पी शिव ज्योति धारण करते,
जो बाण नहीं मुड़ते बिंध जाने पे,
लक्ष्य उनका अभिनन्दन करता है|

जो दीप नहीं बुझते तूफानों में भी,

उजियारा उनका अभिनन्दन करता है|

Sunday, September 4, 2011

दुआ


हँसने का हँसाने का हुनर ढूंढ रहे हैं
हम लोग दुआओं में असर ढूंढ रहे हैं

अब कोई हमें ठीक-ठिकाने तो लगाए
घर में हैं मगर अपना ही घर ढूंढ रहे हैं

जब पाँव सलामत थे तो रस्ते में पड़े थे
अब पाँव नहीं हैं तो सफ़र ढूंढ रहे हैं

क्या जाने किसी रात के सीने में छिपी है
सूरज की तरह हम भी सहर ढूंढ रहे हैं

हालात बिगड़ने की नई मंज़िलें देखो
सुकरात के हिस्से का ज़हर ढूंढ रहे हैं

कुछ लोग अभी तक भी अंधेरे में खड़े हैं
कुछ बात  करने की सहर  ढूंढ रहे हैं

हँसने का हँसाने का हुनर ढूंढ रहे हैं
हम लोग दुआओं में असर ढूंढ रहे हैं

Saturday, July 2, 2011

मन

उस पर जाने किस किसका तो बंधन होता है
अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है ।

तन से मन की सीमा का अनुमान नहीं लगता
तन के भीतर ही मीलों लम्बा मन होता है ।

वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को
जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।

अँधियारा क्या घात लगाएगा उस देहरी पर
जिस घर रोज उजालों का अभिनन्दन होता है ।

दुख की भाप उठा करती हैसुख के सागर से
ऐसा ही, ऐसा ही शायद जीवन होता है ।

हम-तुम सारे ही जिसमें किरदार निभाते हैं
पल-पल छिन-छिन उस नाटक का मंचन होता है ।

तन की आँखें तो मूरत में पत्थर देखेंगी
मन की आँखों से ईश्वर का दर्शन होता है ।

Friday, July 1, 2011

Dream



I have a dream
That a mermaid realm
From deep in ocean main
Is wooing me to swim
In an ecstatic élan
Clasping to their bosom


I have a dream
Someone is humming
From a celestial domain
To come and dine
With them in the halos
Of angelic shine


Let me yarn these whims
It’s my right to dream
My well-cherished regime
Be it far from realism
I’ll be happy to resign
From this unromantic pragmatism
 

Wednesday, June 29, 2011

जब से मैं

यह शब्द मेरे कुछ उन दोस्तों के नाम है जो समाज की बंदिशों को तोड़कर आगे आये है कुछ मेरे तरह और आज दुनिया उन्हें उगते सूरज की तरह देखता है, उन दोस्तों को के लिए ख़ास

जब से मै छपने लगा अख़बार में
बढ़ गयी क़ीमत मेरी बाज़ार में



अस्ल रिश्तों का खुल़ासा कल हुआ
जब उन्हे परखा गया मँझधार में



बन्द कर आँखें मैं तेरे पास हूँ
ढूँढता है क्यूँ मुझे अश्जार में



कौन दरवाज़े पे आ कर रूक गया
सुगबुगाहट बढ़ गयी है बार में



जुर्म उनका कल सुबह साबित हुआ
शाम वो शामिल हुए सरकार में



रौशनाई उठ क़लम का साथ दे

दीमकें लगने लगी तलवार में



Sunday, June 26, 2011

रहनुमा

रस्म ऐ दुआ ना दूर से निभाइए जनाब
 हैं मेरे रहनुमा तो कभी आईये जनाब

अखबार रसालों में इतना खाश क्या है दर्ज
दिले कागजात पर नज़र घुमाइए जनाब

इस तरह नही तोड़ते उमीदे आशियाँ
झूठी सही कोई आस तो दिलाइये जनाब


बसते हो इतने दूर यादों तक की दुश्वारी
ख्वाबों में ही कभी नज़र तो आइये जनाब


नज़र की आरजू है दिले आईने की ख्वास्त
नज़रों से मेरी नज़रें भी मिलाइए जनाब

कैसा हमेशा देखना गैरों के ऐब ही
आँखों को कभी आइना दिखाइए जनाब


कहते हैं इनायत का आगाज़ नही आसां
तदबीर हैं, ताबीर भी बताइए जनाब


चेहरे की सुर्खियाँ तो ढलती हैं ढलेंगी
दिल की रकम न चेहरों पे लुटाइए जनाब


बड़ी – बड़ी बातों का क्या होता है सबब
पने अमल का दायरा बढ़ाइए जनाब



ये झूठ है अगर तो खफा होइए जरूर
थोडा भी सच अगर है मुस्कुराइए जनाब



ये तुझसे अकीदत के हैं चंद लफ्ज़ दोस्त
ना मीर की ग़ज़ल इन्हें बनाइये जनाब



समर्पण

दोस्तों यह मेरा एक समर्पण है इंसान की शक्ल मेरे भगवान् को........ मेरी अपनी माँ को ........


धड़कते, सांस लेते, रुकते-चलते मैंने देखा है,

कोई तो है जिसे अपने में पलते मैंने देखा है.

तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों में ख़्वाब रोशन हैं,

तुम्हारी आदतों में ख़ुद को ढ़लते मैंने देखा है.

मेरी ख़ामोशियों में तैरती हैं तेरी आवाज़ें,

तेरे सीने में अपना दिल मचलते मैंने देखा है.

किसी की रहनुमाई की मुझे अब क्या ज़रूरत है,

तुम्हारा नूर अपने साथ चलते मैंने देखा है.

मुझे मालूम है उनकी दुआएं साथ चलती हैं,

सफ़र की मुश्किलों को हाथ मलते मैंने देखा है.

तुम्हारा अज़्म है जो ख़्वाब में आवाज़ देता है,

ख़ुद अपने आपको नींदों में चलते मैंने देखा है.

कोशिश

करे कोशिश अगर इंसान तो क्याक्या नहीं मिलता
वो उठकर चल के तो देखे जिस रस्ता नहीं मिलता !

भले ही धूप हो, कांटे हों पर चलना ही प़डता है
किसी प्यासे को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता !

कहें क्या ऐसे लोगों से जो कहकर ल़डख़डाते हैं
कि हम आकाश छू लेते मगर मौका नहीं मिलता !

कमी कुछ चाल में होगी, कमी होगी इरादों में
जो कहते कामयाबी का हमें नक्शा नहीं मिलता!

हम अपने आप पर यारो भरोसा करके तो देखें
कभी भी ग़िडग़िडाने से कोई रुतबा नहीं मिलता!

Wednesday, June 22, 2011

आईने से

आईने से कब तलक तुम अपना दिल बहलाओगे


छाएँगे जब-जब अंधेरे ख़ुद को तन्हा पाओगे।



हर हसीं मंज़र से यारों फ़ासले क़ायम रखो

चाँद गर धरती पे उतरा देखकर डर जाओगे।



आरज़ू, अरमान, ख्व़ाहिश, जुस्तजू, वादे, वफ़ा

दिल लगाकर तुम ज़माने भर के धोखे खाओगे।



आजकल फूलों के बदले संग की सौग़ात है

घर से निकलोगे सलामत, जख्म़ लेकर आओगे।



ज़िंद़गी के चंद लम्हे ख़ुद की ख़ातिर भी रखो

भीड़ में ज़्यादा रहे तो ख़ुद भी गुम हो जाओगे।



हाले-दिल हमसे न पूछो दोस्तों रहने भी दो

इस तकल्लुफ़ में तो तुम अपने चलन से पाओगे।

इन सहमे हुए शहरों की फजा कुछ कहती है

इन सहमे हुए शहरों की फजा कुछ कहती है


कभी तुम भी सुनो, ये धरती क्या कुछ कहती है

ये ठिठरी हुई लम्बी रातें कुछ पूछती हैं

ये खामोशी आवाज़नुमा कुछ कहती है

सब अपने घरों में लम्बी तान के सोते हैं

और दूर कहीं कोयल की सदा कुछ कहती है

कभी भोर भए, कभी शाम पड़े, कभी रात गए

हर आन बदलती रुत की हवा कुछ कहती है

नासिर आशोबे- ज़माना से गाफ़िल न रहो

कुछ होता है जब ख़ल्के-खुदा कुछ कहती है

सीने में बसर करता है

सीने में बसर करता है ख़ुशबू सा कोई शख़्स,


फूलों सा कभी और कभी चाकू सा कोई शख़्स।



पहले तो सुलगता है वो लोबान के जैसे,

फिर मुझमें बिखर जाता है ख़ुशबू सा कोई शख़्स।



मुद्दत से मिरी आँखें उसी को हैं संभाले,

बहता नहीं अटका हुआ आँसू सा कोई शख़्स।



ख़्वाबों के दरीचों में वो यादों की हवा से,

लहराता है उलझे हुए गेसू सा कोई शख़्स।



बरगद का शजर देखा तो इक हूक सी उट्ठी ,

जब बिछड़ा था मुझसे मिरे बाजू सा कोई शख़्स।



ग़ज़लों की बदौलत ही तो वो मुझमें बसा है

सरमाया ऐ हस्ती है उर्दू सा कोई शख़्स।



नाकामी के घनघोर अंधेरों मे भी संकल्प

मिल जाता है उम्मीद के जुगनू सा कोई शख़्स।



सिसकियाँ

भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों


किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों।



तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन

धुआँ हो, चिमनियाँ हों, फूल कम हों, तितलियाँ कम हों।



फिसलते ही फिसलते आ गए नाज़ुक मुहाने तक

जरूरी है कि अब आगे से हमसे गल्तियाँ कम हों।



यही जो बेटियाँ हैं ये ही आखिर कल की माँए हैं

मिलें मुश्किल से कल माँए न इतनी बेटियाँ कम हों।



दिलों को भी तो अपना काम करने का मिले मौका

दिमागों ने जो पैदा की है शायद दूरियाँ कम हों।



अगर सचमुच तू दाता है कभी ऐसा भी कर ईश्वर

तेरी खैरात ज्यादा हो हमारी झोलियाँ कम हों।

अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है

उस पर जाने किस किसका तो बंधन होता है


अपना मन भी आखिर कब अपना मन होता है ।



तन से मन की सीमा का अनुमान नहीं लगता

तन के भीतर ही मीलों लम्बा मन होता है ।



वह भी क्या जानेगा सागर की गहराई को

जिसका उथले तट पर ही देशाटन होता है ।



अँधियारा क्या घात लगाएगा उस देहरी पर

जिस घर रोज उजालों का अभिनन्दन होता है ।



दुख की भाप उठा करती हैसुख के सागर से

ऐसा ही, ऐसा ही शायद जीवन होता है ।



हम-तुम सारे ही जिसमें किरदार निभाते हैं

पल-पल छिन-छिन उस नाटक का मंचन होता है ।



तन की आँखें तो मूरत में पत्थर देखेंगी

मन की आँखों से ईश्वर का दर्शन होता है ।

Saturday, July 24, 2010

माँ

जब कभी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है

माँ  दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
मैं रोया परदेस में भीगा माँ का प्यार
दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार
छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार
आँखों भर आकाश है बाहों भर संसार

लेके तन के नाप को घूमे बस्ती गाँव
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव
सबकी पूजा एक सी अलग-अलग हर रीत
मस्जिद जाये मौलवी कोयल गाये गीत
पूजा घर में मूर्ती मीर के संग श्याम
जिसकी जितनी चाकरी उतने उसके दाम


सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक भूखा रहे फ़कीर
अच्छी संगत बैठकर संगी बदले रूप
जैसे मिलकर आम से मीठी हो गई धूप

सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास
पाना खोना खोजना साँसों का इतिहास
चाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान
मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान

Sunday, November 29, 2009

ख्वाब मरते नहीं

जिस्म  मरते  हैं , ख्वाब  मरते  नहीं

आप  क्यूँ  मेरा  यकीं  करते  नहीं

माँ  की  आँखों  में  बेटी  की  शादी  का  ख्वाब
बेटा  बड़ा  आदमी  बने , ये  पिता   का  ख्वाब
पोते - पोतिओं  को  खिलाना  दादा  का  ख्वाब
पोते  की  शादी  देखूं , होता  है  ये  दादी  का  ख्वाब
 आरज़ू  मरती  नहीं , ख्वाब  मरते   नहीं
आप  क्यूँ  मेरा  यकीं  करते  नहीं


होते  है  दादी - नानी  की  कहानियो  में  ख्वाब
बहुत  लाज़मी  है  ज़िन्दगी  में  ख्वाब
छुपे  होते  हैं  हर  अल्फाज   हर  मन  में  ख्वाब
 ये  ख्वाब  अपने  दिलों , अपनी  सांसों  की  तरह
 रेज़ा - रेज़ा  होकर  बिखरते  नहीं
 आप  क्यूँ  मेरा  यकीं  करते  नहीं



ख्वाब , रौशनी   और  हवा  की  तरह  होते  हैं
 ख्वाब , आजाद  मिजाज़  खुशबुओं  के  झोंके  हैं
 मानिंद - ऐ - वक़त  ये  भी  कहीं  टहरते  नहीं
 आप  क्यूँ  मेरा  यकीं  करते  नहीं

ख्वाब  प्रेरणा  हैं ,ख्वाब  सत्रोत  हैं
 हर  हकीकत , हकीकत  से  पहले
 समझो  एक  ख्वाब  ही  होता  है
 सोचो ! चाँद  पर  जाने  का  अगर
हमारे  ज़हन  में  कोई  ख्वाब  नहीं  होता
 तो  हम  कभी  चाँद  पर  उतरते   नहीं
आप  क्यूँ  मेरा  यकीं  करते  नहीं

Saturday, November 28, 2009

मोको कहां ढूढे रे बन्दे




मोको कहां ढूढे रे बन्दे
मैं तो तेरे पास में



ना तीर्थ मे ना मूर्त में
ना एकान्त निवास में
ना मंदिर में ना मस्जिद में
ना काबे कैलास में

                                     मैं तो तेरे पास में बन्दे
                                     मैं तो तेरे पास में
ना मैं जप में ना मैं तप में
ना मैं बरत उपास में
ना मैं किर्या कर्म में रहता
नहिं जोग सन्यास में
नहिं प्राण में नहिं पिंड में
ना ब्रह्याण्ड आकाश में
ना मैं प्रकति प्रवार गुफा में
नहिं स्वांसों की स्वांस में

खोजि होए तुरत मिल जाउं
इक पल की तालाश में
कहत कबीर सुनो भई साधो
मैं तो हूँ विश्वास में


  - कबीर